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‘उपेन्द्र यादव’ का सत्तारोहण

Nirbhay Karn
Nirbhay Karn

Upendra yadav 1निर्भय कर्ण : 

नेपाल में के. पी. शर्मा ओली के नेतृत्व में सरकार बनते ही यह कयास लगाया जाने लगा था कि प्रदेश 2 में भी आज न कल कम्युनिस्ट पार्टी फोरम के सहयोग से सरकार बना सकती है। और इसके लिए प्रयास बहुत पहले ही शुरू हो चुका था। संघीय समाजवादी फोरम ने प्रदेश 2 में चुनाव में काफी अच्छा प्रदर्शन किया था। हालांकि उस समय पूरे देश में खासकर मधेश में मधेश की समस्याओं को लेकर चुनाव पूर्व से ही लगभग सभी मधेशी दल लामबंद थे। जिसका असर चुनाव परिणाम के बाद के कुछ महीने तक रहा। और मधेश में मधेशी दलों की सरकार बनी। कुल मिलाकर देखा जाए तो नेपाल के 7 प्रदेशों में से केवल एक ऐसा प्रदेश था जहां कम्युस्टिं की सरकार नहीं बन पायी। लेकिन अब वो दिन दूर नहीं जब प्रदेश -2 में भी कम्युनिस्ट सरकार होगी।

बीते दिनों में राजनीति ने कई आयामों को छूआ है। सबसे पहले भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनकपुर आये, इस दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री लाल बाबू राउत के संबोधन ने केंद्र सरकार को हिला डाला। राउत ने अपने संबोधन में कहा था कि ‘‘केन्द्र सरकार और संविधान के विभेद के कारण मधेशी समुदाय पीछे पड़े हैं और उसके विरुद्ध संघर्ष जारी है।’’ इस अभिव्यक्ति के बारे में संघीय समाजवादी फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ने स्वंय भी यह स्पष्ट किया कि ‘‘भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की नेपाल भ्रमण के दौरान मुख्यमन्त्री लालबाबु राउत द्वारा व्यक्त अभिव्यक्ति देशभक्ति से ओतप्रोत है। उनका मानना है कि प्रदेश में जो राजनीतिक विभेद और असमानता है, उसके बारे में भारतीय प्रधानमन्त्री को जानकारी देना स्वाभाविक है।’’Upendra Yadav

केंद्र सरकार मुख्यमंत्री की इस अभिव्यक्ति से असंतुष्ट थी और प्रधानमंत्री ओली ने इस बारे में अपनी असंतुष्टि सार्वजनिक तौर पर जाहिर भी किया था। वहीं कुछेक ने मुख्यमंत्री की अभिव्यक्ति को सही करार दिया तो कईयों ने इसे गलत कहा। ऐसे में उसी दिन से लाल बाबू राउत के मुख्यमंत्री पद पर तलवार लटकने लगी।

इसी क्रम में केंद्र ने मुख्यमंत्री को अमेरिका जाने से रोक दिया। याद रहे कि एसोसिएशन आफ अमेरिका द्वारा अपने प्रथम सम्मेलन में मुख्यमन्त्री राउत को प्रमुख अतिथि के रुप में अमेरिका बुलाया गया था। लेकिन ओली सरकार ने सरकार की नीति तथा कार्यक्रम को कारण मानते हुए मुख्यमन्त्री राउत को अमेरिका जाने से रोका। इस बारे में इतिहास कहता है कि किसी भी मुख्यमंत्री को विदेश दौरे को रोकने का काम पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले सन् 2008 में कोशी बांध टूटने पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतिश कुमार सिर्फ हवाई सर्वेक्षण करना चाहते थे पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इजाजत नहीं दी थी। इसके बाद सन् 2009 में लालू प्रसाद यादव नेपाल भ्रमण में आना चाहते थे पर मनमोहन सिंह ने इजाजत नहीं दी। वहीं सन् 2012 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सीएआईएन के एक कार्यक्रम में काठमांडू आना चाहते थे पर उस समय भी मनमोहन सिंह ने उनको नेपाल आने की इजाजत नहीं दी। कहने का यथार्थ यह कि ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां मुख्यमंत्री के भ्रमण पर केन्द्र सरकार रोक लगाती रही है। लेकिन इन बातों को मीडिया में प्रचारित नहीं किया गया लेकिन यहां के मीडिया में इसका ढिंढोरा पीटा गया। राजनीतिज्ञ कहते हैं कि ‘‘इससे जाहिर होता है कि ओली सरकार की मंशा कुछ और थी या यूं कहें कि ओली ने नरेंद्र मोदी के भ्रमण के दौरान हुए अपने अपमान का बदला ले लिया। इस तरह का घटनाक्रम अतिवादी मानसिकता को दर्शाता है।’’ हालांकि मधेश एसोसिएशन आफ अमेरिका द्वारा आयोजित इस प्रथम सम्मेलन को मुख्यमन्त्री लाल बाबू राउत ने लाइव सम्बोधन किया।

उधर संघीय समाजवादी फोरम, नेपाल के नेतृत्व में प्रदेश नं. 2 में निर्मित सरकार को दिया गया समर्थन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) ने वापस ले लिया। इस बारे में सांसद रामचन्द्र मण्डल ने कहा कि आज से ही मुख्यमन्त्री लाल बाबू राउत को दिया गया समर्थन वापस लेते हैं। इस समर्थन वापसी के कारणों के बारे में मण्डल का कहना था कि भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के नेपाल भ्रमण के दौरान मुख्यमन्त्री राउत ने विवादास्पद अभिव्यक्ति दिया था। साथ ही इस दौरान सरकार ने प्रतिपक्षी दल को बिल्कुल ही वास्ता नहीं किया। इसलिए सरकार को समर्थन करते रहना का कोई अर्थ नहीं है।

इसी बीच संघीय समाजवादी फोरम नेपाल ने सबको चौंकाते हुए देश की कम्युनिस्ट सरकार में शामिल होने का फैसला किया। इससे पहले फोरम और प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली की पार्टी के बीच एक समझौता हुआ कि सरकार मधेसियों की ‘उचित’ मांगों पर गौर करेगी।  फोरम के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ने नेकपा के दो अध्यक्षों, के पी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किये।  इस समझौते के तहत प्रधानमंत्री ओली की सरकार इस बात के लिए सहमत हुई कि वह आंदोलन के दौरान फोरम द्वारा उठाये गए मुद्दों और संविधान संशोधन से जुड़े विषयों को आपसी समझ के आधार पर सुलझाएगी।

इस बीच नेकपा एमाले और माओवादी केंद्र के बीच एकीकरण होकर एक पार्टी का सपना साकार होते हुए ‘नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी’ अपना काम करने लगी है। वर्तमान में एमाले और माओवादी केन्द्र की पार्टी एकता पश्चात बने नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी केंद्र और 6 प्रदेशों में एक साथ सत्ता में है। इस एकता के बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी प्रदेश नम्बर दो में भी 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गयी है। वहीं 29 सीटों के साथ उपेन्द्र यादव की पार्टी सँसफो दूसरे और 25 सीटों के साथ राजपा तीसरे स्थान पर है।

इसी क्रम में ओली सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार 1 जून को किया गया। इसमें दो नए मन्त्री को नियुक्त किया गया तो दो पुराने मन्त्रियों को तरक्की दी गयी। जिसमें संघीय समाजवादी फोरम, नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव का नाम मधेशियों को विस्मित कर गया। उपेन्द्र यादव को उप प्रधानमन्त्री सहित स्वास्थ्य मन्त्री बनाया गया। साथ ही इसी पार्टी के मोहमद इस्तियाक राई को शहरी विकास मन्त्री दिया गया। वहीं रक्षामन्त्री ईश्वर पोखरेल को भी उपप्रधानमन्त्री बनाया गया। साथ ही गोकुल बास्कोटा को राज्यमन्त्री पद का शपथ दिलाया गया।

इस प्रकार ओली सरकार को और भी संघीय समाजवादी फोरम के रूप में और भी मजबूती मिल गयी। इस घटनाक्रम से यह लगभग तय हो ही गया कि प्रदेश 2 में भी अब कम्युनिस्ट सरकार बनकर रहेगी और लाल बाबू राउत सरकार का गिरना तय है। हालांकि मुख्यमन्त्री लालबाबु राउत प्रदेश 2 के मुख्यमंत्री के फेरबदल को केवल अफवाह और निराधार बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। साथ ही कहा कि प्रदेश में राजपा के साथ गठबंधन नहीं टूटेगा और यहां 5 साल तक सरकार चलेगी।

उपेन्द्र यादव द्वारा केंद्र सरकार में शामिल होने से राजपा एकाएक बैकफुट पर आ गयी है। और उपेन्द्र यादव पर आरोप-प्रत्यारोप के साथ बधाई व शुभकामनाएं देने का दौर भी चल पड़ा है। फोरम के सत्तारोहण होते ही सरकार ने दो-तिहाई शक्ति अर्जित कर लिया है। 275 संसदीय सीटों में नेकपा के अकेले 174 सदस्य हैं। फोरम का 16 सदस्य के आते ही सरकार के पक्ष में 190 सांसद हो गए यानि कि कुल संख्या का 69 प्रतिशत। यह याद रहे कि संसद में संघीय समाजवादी फोरम 16 सदस्यों के साथ चौथी सबसे बड़ी पार्टी है। इस बारे में शहरी विकास मंत्री मोहम्मद इस्तियाक राई कहते हैं कि ‘‘इस बार का मुख्य मिशन संविधान संशोधन है। संसद में दो-तिहाई की संख्या पहुंचाने के लिए सरकार में सहभागी हुए हैं।’’ वहीं फोरम के अध्यक्ष एवं उपप्रधानमंत्री तथा स्वास्थ्य मंत्री उपेन्द्र यादव ने कहा कि ‘‘संविधान संशोधन केवल कहने भर से नहीं होता। संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत नहीं पहुंच पा रहा था। हमारी सहभागिता सरकार को केवल दो-तिहाई बहुमत पहुंचाने के लिए ही नहीं बल्कि सरकार के भीतर रहकर संघर्ष कर संविधान संशोधन कराना है।’’

अब यह देखने वाली बात होगी कि आखिर मधेश हितों को ध्यान में रखते हुए संघीय समाजवादी फोरम संसद में संविधान संशोधन करा पाती है या नहीं। क्यूंकि इससे पहले भी इस तरह के घटना की पुनरावृत्ति हो चुकी है। जिसमें मधेशी दल ने बारंबार केंद्र सरकार को समर्थन देती रही लेकिन हाथ में कुछ नहीं आया। यदि इस बार भी संविधान संशोधन मधेश के अनुकूल नहीं होता है तो फिर से मधेशियों को हताशा का सामना करना पड़ सकता है। क्यूंकि इसबार का स्थानीय चुनाव हो या फिर प्रादेशिक चुनाव या फिर प्रतिनिधि सभा का चुनाव, सबों में मधेशियों को जो मत मिला वो मधेशियों के हक-अधिकार दिलाने के वादों पर ही। ऐसे में इस बार का संविधान संशोधन अति महत्वपूर्ण हो जाता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार केंद्र सरकार फोरम के साथ किए हुए समझौतों की लाज रखते हुए संविधान संशोधन करेगी ताकि मधेश में शांति, स्थिरता व विकास का रास्ता प्रशस्त हो सके।

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