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कुर्सी की जिद्दोजहद

कुर्सी की जद्दोजहद

Nirbhay Karn
Nirbhay Karn

निर्भय कर्ण  :
देश में चुनावी बिगुल तो चुनावी घोषणा के साथ ही बज उठा था। हालांकि अब समानुपातिक सहित प्रत्यक्ष उम्मीदवारों के मनोनयन दर्ता के साथ ही राजनीतिक माहौल अब गरम हो चुका है। उम्मीदवार के पास अब काफी कम वक्त रह गया है। ज्ञात हो कि संसदीय एवं प्रांतीय निर्वाचन दो चरणों में क्रमशः 26 नवंबर और 8 दिसंबर को होना है। इन चुनावों में 128 संसदीय एवं 256 प्रांतीय सदस्यों के लिए निर्वाचन होने जा रहा है। ऐसे में उनके पास सुनामी प्रचार-प्रसार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं रह गया है। यही वजह है गांव के चैपाल सहित चाय की दुकानों पर राजनीतिक चर्चा आम हो चली है। इस बार के चुनाव में प्रदेश सभा का चुनाव बिल्कुल ही नया है। नए संविधान के मुताबिक प्रदेश सभा का संरचना किया गया है। ऊपर से वामगठबंधन और लोकतांत्रिक गठबंधन ने देश की राजनीति को एक नयी ही दिशा देने की कोशिश की है। ऐसे में अब यह देखने वाली बात है इस बार का चुनाव क्या रंग दिखाती है और इसका असर जनता पर क्या पड़ता है। क्या इस चुनाव के बाद नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का दौर खत्म होगा और नेपाल नए विकास की गाथा को लिख पाने में सफल होगा?, क्या जनादेश किसी एक गठबंधन के पक्ष में होगा या फिर जनादेश खंडित होगा?, यह सवाल सभी के जेहन में है।कुर्सी की जिद्दोजहद

राजनीति के दो ध्रुवों में बंट जाने के कारण सीटों के लिए काफी मारा-मारी देखने को मिला। नतीजतन कई बागी उम्मीदवार निकल कर आये और स्वतंत्र रूप से अपनी-अपनी उम्मीदवारी पेश कर दिया। बागी और अन्य स्वतंत्र उम्मीदवार दूसरे उम्मीदवारों के मनसूबा पर कितना पानी फेरने में सफल होते हैं या नहीं, यह चुनावी परिणाम तय करेगा। लेकिन यह तय हो चला है कि इस बार की कुर्सी की जद्दोजहद पिछले चुनावों से ज्यादा कठिन है।

अंतिम क्षण तक कांगे्रस और मधेशी दलों के बीच गठबंधन नहीं हो पाने की वजह से कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौतियां हैं, पहली चुनौती वाम गठबंधन तो दूसरा मधेशी दल। इसके अलावा अन्य दल भी कांग्रेस के लिए मुसीबत का पहाड़ खड़ा करने पर उतारू है। इन सब समीकरणों पर गौर करें तो कहीं न कहीं लोकतांत्रिक गठबंधन कमजोर पड़ती नजर आ रही है। हालांकि सूत्रों की मानें तो अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस का राजपा एवं संघीय समाजवादी फोरम नेपाल के साथ कई सीटों पर मौन गठबंधन हुआ है। यह बात भी हुयी कि राजपा और संघीय समाजवादी फोरम के वरिष्ठ नेता जहां-जहां मैदान में हैं वहां पर अधिकतर कांग्रेस के उम्मीदवार उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देंगे। कमोबेश यही बात राजपा और फोरम पार्टी पर भी लागू होता है।

राजपा के प्रमुख नेताओं में से एक राजेन्द्र महतो धनुषा-3 से चुनाव लड़ रहे हैं और उनके सम्मुख प्रमुख विपक्षी के रूप में कांग्रेस के दिग्गज नेता विमलेन्द्र निधि मैदान में हैं। दोनों ही दिग्गज नेता हैं ऐसे में कोई भी एक-दूसरे के लिए सीट छोड़ने को तैयार नहीं हुए। और वहां हालात ऐसी बन चुकी है कि यह सीट दोनों नेताओं के लिए नाक की लड़ाई बन चुकी है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में संजय टकला का जिसे वरदहस्त हासिल हो जाता है, तो उस उम्मीदवार के जीतने की संभावना प्रबल हो जाती है। हालांकि संजय अभी जेल में है इसके बावजूद उसका क्षेत्र में कुछ इस कदर पकड़ है कि उसके आर्शीवाद के बिना किसी के लिए जीत पाना मुश्किल है। और इस बार संजय टकला का आर्शीवाद विमलेन्द्र निधि को मिलने की संभावना जतायी जा रही है। ऐसे में यहां का मुकाबला भी काफी रोचक हो गया है।

कुल मिलाकर, गठबंधनों के बीच कुर्सी के लिए खासा जद्दोजहद होने वाला है। चुनावी प्रचार शुरू होने के साथ ही 7 प्रदेशों के मुख्यमंत्री के लिए भी दावेदार खुल कर आने लगे हैं। एक का मैदान में आते ही अन्य दावेेदार भी अपने आपको मुख्यमंत्री का दावेदार घोषित करने में लगे हैं। वाम गठबंधन यानि एमाले के अध्यक्ष के. पी. ओली ने दावा किया है कि वाम गठजोड़ सामान्य से अधिक बहुमत हासिल करेगा। जबकि दूसरा गठबंधन यानि कि लोकतांत्रिक गठबंधन वाम गठबंधन को अलोकतांत्रिक बता रहा है और कह रहा है कि यह देश को निरंकुशतावाद की तरफ ले जाएगा। राजपा के ही महासचिव ‘मनीष सुमन’ ने बातचीत के दौरान बताया कि ‘‘यह अंदेशा आपका गलत है कि वाम गठबंधन सरकार बना लेगी। यहां के मतदाता किसी के खरीदे हुए मतदाता नहीं हैं। वाम गठबंधन को यह भ्रम न हो कि यहां मेरा वोट बैंक है, यहां के मतदाता हमारे बंधुआ मजदूर हैं, यहां तक कि इनके कार्यकर्ता भी इस मुल्क में कम्युनिज्म नहीं चाहते हैं। जिसके कार्यकर्ता नहीं चाहते हों, केवल नेता चाहते हों कि इस मुल्क को कम्युनिज्म बना दें तो ऐसा नहीं हो सकता है। उनकी डंका नहीं बजेगी। मतदाता परिवर्तनशील है, वो विकास और समतामूलक को महत्व देगा, इस तरीके से देखें तो कहीं भी वाम गठबंधन की सरकार नहीं बनने जा रही है।’’

यथार्थ यह कि राजनीतिक हवा किस ओर बह रही है, इसका पता तो कुछ दिनों में चलेगा और अंततः इन चुनावों के परिणाम के बाद ही पता चलेगा कि किसकी बातों में कितना दम है और जनता क्या चाहती है। वैसे उम्मीद की जानी चाहिए कि नेपाल की जनता राजनीतिक स्थिरता के लिए जनादेश देगी। नेपाल की राजनीति में परिपक्वता आनी ही चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो नेपाल में अस्थिरता का नया दौर शुरू हो सकता है।

 

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