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जिस पर सौ सेकण्ड का भरोसा नहीं उससे सौ साल की बात कैसे…..?

modi-jinpingओमप्रकाश मेहता : 
चीन में जो भी बात होगी या मसौदों पर हस्ताक्षर होंगे, वे प्रधानमंत्री जी के भारत लौटने तक ही कायम रह पाएं तो भारत की बड़ी उपलब्धि होगी, क्योंकि चीन के आजीवन राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी सत्तासीमा खत्म कराने के बाद तानाशाही मुद्रा में आ गए हैं और वे अब अपने सामने किसी को कुछ भी नहीं समझते।
भारत के हमारे मौजुदा हुक्मरानों ने शायद हमारे धोखेबाज पड़ौसी चीन के इतिहास को विस्मृत कर दिया है, जिस ड्रेगन (अजगर) की हम पिछले सत्तर सालों में पूंछ तक टेढ़ी नहीं कर पाए और जो कदम-कदम पर हमें धोखा देता आ रहा है, उस चीन से दोस्ती की उम्मीद करना कहां की बुद्धिमानी है? जो देश आज से छप्पन साल पहले से “हिन्दी-चीनी भाई-भाई” का नारा लगा कर हमारी पीठ में छुरा भौंकता आया है, उसकी कुटिल मुस्कान पर हम कैसे भरोसा कर सकते है?

जो देश हमारी चारों तरफ से घेराबंदी कर रहा है, हम पर नजर रखने के लिए जिसने श्रीलंका के समुद्र तटीय शहर हंबन टोटा पर कब्जा कर वहां अपना सैनिक बैड़ा तैनात कर दिया, जिसने भारत के पड़ौसी देश पाकिस्तान को अपना सैनिक उप-निवेश बना लिया, जो देश हमारे अपने सीमावर्ती राज्य अरूणांचल को अपना हिस्सा बताकर उसका अस्तित्व ही खत्म कर रहा है, उस देश पर हमारे मौजुदा हुक्मरान इतना भरौसा आखिर क्यों कर रहे है?
यह सही है कि चीन अपने हित साधना अच्छी तरह जानता है, उसकी जब गरज होती है तो यह अजगर अपनी पूंछ हिलाने लगता है और जब भारत सहित किसी दूसरे देश का कोई हो तो जहरीली फुंफकार मारने लगता है, फिर भारत का तो इतिहास रहा है, जब-जब चीन की कोई भी हस्ती भारत आती है, चाहे वह राजनायिक मिशन पर आए या शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने, ठीक उसी समय हमारी सीमा पर चीनी उपद्रव बढ़ता ही है, अब मोदी जी चीन जा रहे हैं, भगवान इस देश की सीमा को महफूज रखे।
अब अपना हित साधने और हमारे हुक्मरानों को खुश करने के लिए हमारे प्रधानमंत्री जी का वहां “लाल जाजमी” (रेड कॉर्पेट) स्वागत करने की तैयारी की जा रही है और चीन व भारत दोनों ही के द्वारा कहा जा रहा है कि अगले सौ साल की बात होगी, अरे, जिस पर हम सौ सैकण्ड का भी विश्वास नहीं कर सकते, उससे अगले एक सौ बरस की बात कैसे की जा सकती है? मुझे तो आशंका है कि चीन में जो भी बात होगी या मसौदों पर हस्ताक्षर होंगे, वे प्रधानमंत्री जी के भारत लौटने तक ही कायम रह पाएं तो भारत की बड़ी उपलब्धि होगी, क्योंकि चीन के आजीवन राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी सत्तासीमा खत्म कराने के बाद तानाशाही मुद्रा में आ गए हैं और वे अब अपने सामने किसी को कुछ भी नहीं समझते।
मोदी जी व शी के बीच होने वाली इस वार्ता की तुलना 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और चीनी शासक डेंग जि आयोपिंग के बीच हुई चर्चा से की जा रही है। चीन के भारत से कई वाणिज्यिक हित जुड़े हुए हैं, भारत और चीन दोनों ही दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने की दिशा में प्रयत्नशील है, साथ ही नेपाल पर दोनों ही देशों की नजर है, चीन नेपाल पर अपना आधिपत्य चाहता है, जबकि नेपाल भारत का परम्परागत पड़ौसी मित्र व सहयोगी रहा है। इसीलिए भारत ने नेपाल और भूटान की दिल खोलकर मदद की है। जबकि दूसरी ओर नेपाल में भारत का प्रभाव कम करने के लिए चीन वहां भारी निवेश कर रहा है, चूंकि नेपाल के नए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का झुकाव शुरू से ही चीन के साथ रहा है, इसलिए भारत नेपाल को लेकर काफी सतर्क है। यही स्थिति चीन व बांग्लादेश की है, चीन ने बांग्लादेश को नौ अरब डॉलर का कर्ज देकर अपना आर्थिक ऋणी बनाया, इस तरह वह उसे अपने पाले में लाने को आतुर है। जबकि भारत में बांग्लादेश में निवेश करने में पीछे नहीं है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि चीन यह मानकर भारत की ओर अपने कदम मजबूती से बढ़ा रहा है कि अगले वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद भी मोदी जी ही प्रधानमंत्री बने रहने वाले हंै, जबकि चीन के राष्ट्रपति पद पर शी जिनपिंग की ताउम्र ताजपोशी को भारत अपने हित में नहीं मानता। अब मोदी की चीन यात्रा का मुख्य केन्द्र मध्यचीन के यायावरी खूबसूरत शहर बुहान को बनाया गया है, चीन के विदेशमंत्री का तर्क है कि मोदी जी चीन के उत्तरी शहर बीजिंग, दक्षिणी शहर शंघाई, पश्चिमी शहर शियाना और पूर्वी शहर शियामेन की यात्रा कर चुके है, इसलिए उनके लिए चीन का मध्य पर्यटन केन्द्र चुना गया है। अब फिलहाल यात्रा की सफलता या असफलता अथवा उपलब्धि के बारे में कुछ कहना तो जल्दबाजी होगी, किंतु फिलहाल तो ईश्वर से यही प्रार्थना की जा सकती है कि मोदी जी की तीन दिनी चीन यात्रा के दौरान हमारी सीमाऐं सही-सलामत व शांत रहे।

स्रोत- राष्ट्रीय हिंदी मेल

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