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Naari sashaktikaran

नारी के बिना राष्ट्र उत्थान असंभव

Shri Bhola Jhaभोला झा : 
भौतिक एवं अभौतिक संसाधनों के समुच्चय से समाज का निर्माण हुआ है। समाज से राज्य, राज्य से राष्ट्र एवं राष्ट्र ये विश्व का निर्माण होता है। इस निर्माण प्रक्रिया की धुरी महिला ही रही है। सभ्यता के आरंभिक काल से लेकर अद्य तन महिला अपना सर्वस्व न्यौछावर कर सर्व हित के लिए योगदान देती आ रही है। महिला के अमूल्य योगदान को निम्न वाक्य से समझा जा सकता है :-
सशक्त नारी सशक्त समाज,
सशक्कत समाज, सशक्त देश।

Naari sashaktikaranमातृत्व के आंगन में मानवीय संसाधन का विकास होता है। नारी मां, पत्नी, बहन, सास, साली, सरहज, भाभी, दादी एवं मित्र व प्रेमिका के रूप में हमें स्नेह देकर कृतार्थ करती है। नारी के बिना नर का अस्तित्व निराधार है। हम सम्पूर्णता को तभी अनुभव करते हैं जब नारी हमें देश काल, परिस्थिति के अनुकूल उचित मार्गदर्शन से अनुग्रहित करती है। इसी संदर्भ में प्राचीन भारत के महाभारत कालीन महान योद्धा व दार्शनिक भीष्म पितामह के वाक्यांश अति अनुकरणीय है। पितामह भीष्म गर-शैय्या पर बैठे न्याय के मूर्ति पांडवों को नसीहत देते हैं कि ‘‘राजा की कुशलता इस तथ्य की मोहताज होती है कि उस राज्य में महिलाओं का सम्मान कितना होता है।’’

यही कारण है कि आज महिला सशक्तिकरण किसी भी सरकार की उपलब्धियों का सार्थक मापदंड बना हुआ है। मैत्रेयी मिथिला वासी याज्ञवल्क्य की पत्नी थी। वह विदुषी और बह्मवादिनी थी। मैत्रेयी याज्ञवल्क्य की अर्धांगिनी होने के नाते उनसे आत्मापलब्धि में हिस्सा चाहती थी। तत्कालीन समय में मैत्रेयी ने स्त्री की मर्यादा को चरमोत्कर्ष पर रखा। प्राचीन इतिहास नारी की महानता से भरा परा है।
कईयों महिलाओं ने जीवन के उच्च आदर्श स्थापित कर आधुनिक महिलाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनी हुई है। देवासुर संग्राम में कैकेयी ने अद्वितीय रणकौशल परिचय देते हुए महाराज दशरथ का प्राण बचा पाने में समर्थ होती है। भारत दासता की जंजीर को यूंही तोड़ पाने में सफल नहीं हुआ था। जब तक कि नारियों ने पुरूषों में देशभक्ति की जज्बा को कुट-कुट कर न भरा हो।
रामप्रसाद बिस्मिल भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय भागीदारी का कर्त्तव्य निर्वहन करना चाहते थे। परन्तु परिवार में मां को छोड़कर दादी एवं पिताजी इसका विरोध करते थे। वह नारी रूप मां ही थी जिन्होंने रामप्रसाद बिस्मिल को क्रांतिकारी जीवन का पाठ पढ़ाया करती थी।
भारत में स्वाधीनता के क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास सन् 1757 ई. में प्लासी के मैदानसे प्रारंभ होता है औेर दो सौ वर्षों के संघर्ष उपरांत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता के समारोह के समारोह के साथ परवान चढ़ता है। इस दिन को स्वर्णाक्षर में लिखने के लिए नारियों ने अभूतपूर्व योगदान दिया है। अंग्रेजों ने जब संतानविहीन राजाओं की रियासतें अंग्रेजी राज्य में मिलाने का नियम बनाया तो कर्नाटक के बेल्लारी जिले की रानी चेनम्मा ने गुलामी के जन्मदाता नियम का विरोध किया। इसी क्रम को बेगम हजरत महल अपनी त्याग, निष्ठां और परोपकार की मूर्ति बनकर उभरी और अपना जीवन गुलामी की जंजीर को तोड़ने में झोंक दिया। सामान्य जीवन से परे कला क्षेत्र की स्त्रियां भी अपने आपको स्वतंत्रता संग्राम रूपी आग से अलग न रह सकी। नृत्य और संगीत की नायिका अजीजन बाई ने पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता की पुकार सुनकर अजीजन ने नृत्य और संगीत की झंकार को क्रांति की चिंगारियों में बदल दिया। सन् 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम में अजीजन कंधों पर बंदूक और हाथ में तलवार ले नाना साहेब पेशवा के सिपाही के रूप में अपना कर्त्तव्य निभाने के लिए कटिबद्ध हो गई। बेगम आलिया, अनूप शहर की चौहान रानी, तुलसीपुर की रानी और बुदरी की क्षत्राणी ने भी परतंत्रता से बाहर निकलने के लिए आग की दरिया पर चलती रही। भारत मां की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने अपने अद्वितीय साहस का परिचय देते हुए अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये। वह सिंहनी की दहाड़ और मां दुर्गा की शक्ति से ओतप्रोत रणक्षेत्र में कूद पड़ी और अंग्रेजों के शासन की जड़ें हिला दी। भगिनी निवेदिता, कस्तूरबा गांधी, दुर्गा भाभी, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, कमला नेहरू, प्रभावती देवी, सोफिया खान, मनीबेन पटेल, राजकुमारी अमृत और शारदा बेन मेहता, नीलीसेन गुप्ता आदि अनेक जानी-मानी महिलाओं ने स्वाधीनता आंदोलन में भाग ले आजाद देश के सपने को साकार किया।
नेपाल सरकार को या भारत सरकार यानि कि किसी भी देश की सरकार हो, उन्होंनें महिलाओं के उत्थान व स्वाभिमान की रक्षा के लिए विभिन्न कानून बनाया ताकि नारी सशक्तिकरण हो सके। ये अधिनियम के पास होने से लिंगभेद को पाटने में मदद मिलती है। परन्तु सरकार के लिए इसे किसी भी हालत में बाध्य करवाना आवश्यक है। तभी जाकर नारियों पर हो रहे अत्याचार को रोका जा सकता है। आधुनिक महिलाएं भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सशक्त भूमिका को दर्ज करवा रही है। नेपाल को ही लें तो यहां की राष्ट्रपति विद्या भंडारी स्वयं एक महिला है और अन्य लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। इसके अलावा भारत की महिला मुख्यमंत्रियों में सुचेता कृपलानी, नंदिनी सतपत्थी, शशिकला काकोड़कर, सैयदा अनवरा तैमूर, जे जयललिता, जानकी रामचन्द्रन, मायावती, राजिंदकर कौर, राबड़ी देवी, सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित, उमा भारती, वसंधुरा राजे सिंधिया, ममता बनर्जी, आनंदी बेन पटेल आदि नारियों को शुमार किया जाता है।
केवल राजनीति ही नहीं बल्कि पर्यावरण, न्याय प्रणाली, स्वास्थ्य, प्रशासनिक, व्यापार, खेल, फिल्म सहित लगभग सभी विभागों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी सराहनीय है और अपना-अपना अतुलनीय योगदान दे रही है।
इसके बावजूद नेपाल-भारत जैसे देश में आज भी इसका समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। हर दिन मीडिया में नारियों के प्रति हो रहे अत्याचार को लिखा जाता है। यह हमारे समाज के लिए शर्मनाक बात है। राष्ट्र चरम अवस्था को प्राप्त नहीं हो सकता है। जब तक कि नारियों को उचित सम्मान न मिले। यह कानून के कठोर दंड से संभव नहीं हो सकता है। इस घोर अपराध को सामूहिक शिक्षा से उन्मूलन किया जा सकता है। शिक्षा केवल औपचारिक ही नहीं होता, यह अनौपचारिक भी होता है। मानव औपचारिक शिक्षा की उच्च अवस्था को प्राप्त कर भी अनैतिक कार्यों में संलग्न रहते हैं। अतः उन्हें अनौपचारिक शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रहित में मोड़ा जा सकता है।
(लेखक पेशे से अध्यापक हैं।)

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