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बुनियादी बदलाव के लिए परिवर्तन की अभी काफी आवश्यकता
बुनियादी बदलाव के लिए परिवर्तन की अभी काफी आवश्यकता

बुनियादी बदलाव के लिए परिवर्तन की अभी काफी आवश्यकता

Dr. Udit Raj
Dr. Udit Raj

                                              (भारतीय स्वतंत्रता दिवस विशेष) 

उदित राज :

भारत की आजादी के 70 वर्ष हो गए। यह वह वक्त है, जब इस बात की जांच हो कि हम सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और शैक्षणिक क्षेत्र में कितना आगे बढ़े? आजादी की लड़ाई में शामिल असंख्य लोगों के सपने साकार हुए या नहीं? स्वाभाविक तौर पर हम परिवर्तन को आसानी से स्वीकार नहीं करते। जहां दबाव और मजबूरी हो, वहां बदलना ही पड़ता है। एकदम ताजा उदाहरण से देखना चाहें तो जीएसटी लागू होने को लेकर लोगों की मानसिकता को देखें। दुनिया के ज्यादातर देशों में जीएसटी लागू हो चुका है। हम यह कवायद देर से कर रहे हैं, तो भी चर्चा हो रही है कि कुछ और समय लेकर करना चाहिए था। हालांकि यह 1 जुलाई से लागू हो गया है और धीरे-धीरे इसकी स्वीकृति बढ़ती जा रही है। राजनीति के क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही दबाव, वातावरण और चाहत होती है कि बदलाव करना ही पड़ता है।

         

बुनियादी बदलाव के लिए परिवर्तन की अभी काफी आवश्यकता
बुनियादी बदलाव के लिए परिवर्तन की अभी काफी आवश्यकता

 सचाई यह है कि पिछले 70 वर्षों में हमारी व्यवस्था के विभिन्न अंगों के चरित्र और कामकाज में भारी तब्दीली आई है। सबसे ज्यादा परिवर्तन विधायिका में देखे जा सकते हैं। अब जन-प्रतिनिधि हमेशा जनता की जबरदस्त निगरानी में रहते हैं। एक समय था जब अपने कार्यकाल में वे कभी-कभार क्षेत्र में घूम जाएं या लोगों से मिल लें तो भी काम चल जाता था, लेकिन आज उन्हें दिन-प्रतिदिन का हिसाब देना पड़ता है। न केवल क्षेत्र की समस्याओं को लेकर बल्कि उनके जीवन के हर पक्ष की समीक्षा की जाती रहती है। जन प्रतिनिधि के वाहन से अगर कोई दुर्घटना हो जाए तो उसकी क्या दुर्गति होगी, कहा नहीं जा सकता, भले ही चालक कोई और हो। उसके बेटे-बेटी भी अगर कुछ हटकर कर दें तो लंबा-चौड़ा हिसाब चुकता करना पड़ता है। असली अदालत जो करेगी सो तो होगा ही, लेकिन मीडिया की अदालत फौरन सजा सुना देती है।

पारिवारिक वातावरण और योग्यता की वजह से अगर पत्नी, बेटा, बेटी या परिवार के लोग राजनीति में आते हैं तो परिवारवाद का आरोप लग ही जाता है। चिकित्सक, वकील, व्यापारी, कलाकार, लेखक, खिलाड़ी आदि के परिवार के लोग अपने पैतृक पेशे में आते हैं तो समाज उन्हें चुनौती नहीं देता कि यह परिवारवाद क्यों? इन दबावों की वजह से भी जन प्रतिनिधियों में बड़ा बदलाव आया है। इस क्षेत्र में परिवर्तन आए तो नौकरशाही भी प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकती है। नौकरशाही जनप्रतिनिधियों के अधीन होती है, इसलिए उसे भी समय के साथ बदलना पड़ा है। पहले डीएम, कमिश्नर, एसपी वगैरह अपने कार्यालय में बैठकर काम कर लेते थे, लेकिन अभी वे भारी दबाव में हमेशा भाग-दौड़ में ही रहते हैं। कोई अप्रिय घटना हो जाए तो तबादला और मुअत्तली मामूली सी बात है। न्यायपालिका न केवल ज्यादा स्वतंत्र हुई है, बल्कि अवमानना के नाम पर लोगों के मुंह बंद हो गए हैं। हालांकि इसकी जवाबदेही नागरिकों के प्रति नहीं है, इसलिए इसमें विशेष परिवर्तन नहीं दिखता है। अन्य क्षेत्रों में परिवर्तन आवश्यकता या दबाववश भले कितना भी हो जाए, लेकिन जब तक समाज का नजरिया नहीं बदलेगा, तब तक आजादी के उद्देश्यों को हासिल करना संभव नहीं है। समाज का भी लेखा-जोखा होना चाहिए, जो आज भी वहीं खड़ा है जहां पहले था। अगर ऐसा न होता तो बेटी बचाने के लिए दौड़-धूप न करनी पड़ती, बिना दहेज के भी शादियां होती। महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर आजादी मिलती। वे सिर पर चरित्र की गठरी बांध कर चलने के लिए मजबूर न होतीं तो उनका भी उत्पादन, शिक्षा और अन्य क्षेत्र में भागीदारी और योगदान पुरुषों के समकक्ष हो गया होता। देश को सबसे कमजोर करने वाला कारण जाति है, उसमें भी परिवर्तन आ गया होता। गांव में शारीरिक छुआछूत अभी भी बरकरार है। शहरों में मानसिक छुआछूत है। देश को ऊंचाई पर न पहुंचने के लिए राजनीति को जिम्मेदार मान करके हम असली कारण तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

           आजादी के 70 वर्ष पूर्ण होने पर जहां हमें पहुंचना चाहिए था, वहां तक हम नहीं पहुंच पाए। उसके लिए समाज कहीं ज्यादा जिम्मेदार है। यह कह देना समस्या का सरलीकरण है कि सरकार में भ्रष्टाचार होने के कारण हम अब तक सही मुकाम पर नहीं पहुंच पाए। दुनिया में तमाम ऐसे देश हैं जहां राजनीतिक भ्रष्टाचार होने के बावजूद उन्होंने अबाध गति से तरक्की की है। जापान, कोरिया और सिंगापुर जैसे देशों में सर्वोच्च पद पर बैठे राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाते रहे हैं, फिर भी देश की प्रगति रुकी नहीं। कारण यह है कि वहां के नागरिकों ने अपनी जिम्मेदारी निभाई, न कि सब कुछ सरकार पर छोड़ दिया। कुछ लोग कहते हैं कि चीन इसलिए तरक्की कर गया कि वहां पर तानाशाही है। ऐसा मानने वाले यह क्यों नहीं देखते कि दक्षिण कोरिया, जापान और सिंगापुर में जनतंत्र है। वहां विकास कैसे संभव हुआ?

दरअसल उन्हीं देशों में प्रगति हुई जहां समाज ने परिवर्तन को स्वीकार किया। हर नागरिक ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। हठवादी और प्रतिक्रियावादी परंपराओं को उखाड़ फेंका गया। समस्त यूरोप का औद्योगीकरण, ज्ञान-विज्ञान, अभिव्यक्ति की आजादी, कला-संस्कृति, राजनीति और न्यायिक व्यवस्था में प्रगति तब हुई जब वहां के समाज में परिवर्तन आया। समाज से बड़ी दूसरी और कोई संस्था नहीं होती। बुनियादी बदलाव के लिए इसमें परिवर्तन आवश्यक है। ऊपर से थोपा गया बदलाव चीजों को एक सीमा तक ही बदल पाता है। आज हमारी स्थिति यही है। इसलिए हरेक नागरिक को यह प्रण करना चाहिए कि वह देश के नवनिर्माण में अपना योगदान देगा।

(लेखक बीजेपी सांसद हैं)

Courtesy : NBT

 

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