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सशक्त होता ‘संविधान’

Nirbhay Karn
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नेपाल को नया राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सभामुख सहित प्रदेशों के राज्यपाल व मुख्यमंत्री मिल चुका है। इसके अलावा देश में अन्य पदों को भरने का कार्य द्रुत गति से जारी है। यानी कुल मिलाकर कहा जाए तो नेपाल में संविधान कार्यान्वयन का कार्य सफलता को चूमने हेतु अग्रसर है।

sanvidhanज्ञात हो कि लगभग एक साल से नेपाल चुनाव की गिरफ्त में रहा है। इसकी शुरुआत मई, 2017 में ही हो गई थी और यह 2018 के पहले सप्ताह तक चलता रहा। संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक यहां तीन स्तरीय चुनाव की व्यवस्था कायम हुआ – ग्राम परिषद/नगर पालिका, राज्य विधानसभा और संघीय संसद। 14 मई, 28 जून और 18 सितंबर, 2017 को तीन चरण में ग्राम परिषद और नगर पालिकाओं की 753 इकाइयों के लिए चुनाव हुए। इसके तुरंत बाद संघीय संसद और राज्यों की विधानसभाओं के लिए चुनाव आयोजित किए गए, जो साथ-साथ 26 नवंबर और 7 दिसंबर को हुए। इसी तरह हाल ही में 7 फरवरी को संसद के ऊपरी सदन यानि राष्ट्रीय परिषद के भी चुनाव हो गए। केन्द्र में जहां पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई वामपंथी मोर्चा की सरकार स्थापित हुयी है। वहीं सात में से छह राज्यों की विधानसभाओं में भी वामपंथी मोर्चा ने अपना परचम लहरा दिया।
7 फरवरी, 2018 को राष्ट्रीय परिषद का चुनाव हुआ, जिसमें सीपीएन-यूएमएल ने 48 प्रतिशत सीटें जीतीं, इसके बाद एनसी रही (13 प्रतिशत)। सीपीएन-एमसी को 21 प्रतिशत सीटें मिलीं। आरजेपीएन और एफएसएफएन को चार-चार प्रतिशत सीटें मिलीं। कुल मिला कर वाम गठबंधन को राष्ट्रीय परिषद में 69 प्रतिशत सीटें हासिल हुईं।
स्थानीय, विधानसभा और संसद के तीनों स्तर के चुनावों के पूरा हो जाने के बाद ऐसा लगता है कि आखिरकार देश संविधान को लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार हो गया है। साथ ही यह ज्ञात हो कि संविधान जिस दिन देश में जारी हुआ था, उस दिन से मधेश में एक तरह से उथल-पुथल ही मच गया था। आंदोलन पर आंदोलन, यहां तक कि देश को नाकेबंदी के दौर से गुजरना पड़ा। यही कारण रहा जिससे नेपाल में भारत विरोधी भावनायें अपने शिखर पर पहुंच गया था। हालांकि भारत ने अपने प्रति इस विरोधी लहर को पाटने की हर संभव कोशिश किया लेकिन नाकेबंदी से पूर्व की भारत प्रति नेपाल की सहानुभूति बटोरने में वह अब तक असफल ही रहा है।

नेकपा एमाले के सुप्रीमां केपी शर्मा ओली फिर से देश की बागडोर संभाल चुके हैं। और 41वें प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अब्बासी को नेपाल दौरा करवाकर भारत के लिए एक बड़ी चुनौती पेष कर दी है। नेपाल ने भारत को यह कड़ा संदेश दे दिया है कि नेपाल केवल और केवल भारत पर आश्रित नहीं रहना चाहता है। बल्कि स्वयं अपने विकास के लिए अन्य देशों खासकर चीन और पाकिस्तान की सहायता लेने को स्वतंत्र है।

हालांकि वाम मोर्चा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह सरकार में कैसा प्रदर्शन करता है। अगर यह तार्किक तौर पर पेश आता है और भौगोलिक-राजनीति में संतुलन का ध्यान रखता है, खास कर भारत और चीन के बीच, तो यह सफल हो सकता है। लेकिन अगर यह इस लक्ष्य में नाकाम रहता है, तो यह बहुत नुकसानदेह साबित हो सकता है। इससे पहले राजशाही के अलावा भी कुछ नेता सिर्फ इसलिए नाकाम साबित हुए, क्योंकि वे इस संतुलन को कायम नहीं कर पाए।

वाम मोर्चा को दूसरा खतरा उन्हीं लोगों से हो सकता है जिन्होंने उन्हें भारी बहुमत दे कर सत्ता में पहुंचाया है। जॉर्ज ओरवेल ने एक बार कहा था, ‘शक्ति भ्रष्ट करती है और संपूर्ण शक्ति पूरी तरह से भ्रष्ट कर देती है।’ बहुत से वामपंथी नेताओं की छवि साफ-सुथरे नेता की नहीं है और इस हकीकत को देखते हुए वे भ्रष्ट गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं। अगर ऐसी स्थिति बनी तो वाम मोर्चा के विपक्षी उन्हें बेनकाब करने के मौके छोड़ेंगी नहीं।

किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि मधेषी दल खासकर संघीय समाजवादी फोरम और राष्ट्रीय जनता पार्टी, नेपाल केन्द्र में ओली सरकार का समर्थन करेगी। जबकि पीएम केपी शर्मा ओली का रवैया हमेशा से ही मधेश विरोधी ही रहा है। अब जबकि ये दोनों मुख्य मधेशी दलों ने ओली सरकार को समर्थन देकर सरकार को तीन-चौथाई बहुमत पूरा कर उन्हें और भी सशक्त बना दिया है। इसके पीछे तर्क यही दिया जा रहा है कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में रहेगी तो मधेशी मांगों को पूरा किए जाने की संभावना प्रबल रहेगी। और जैसे ही इन दलों ने सरकार का समर्थन किया वैसे ही वाम मोर्चा पर अपनी मांगों को मनवाने हेतु दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। 2015-16 के मधेश आंदोलन के दौरान उनकी जो मांगे पूरी नहीं हुईं, उनको पूरा करने का दबाव बनाया जा रहा है। दरअसल, ये पार्टियां इस वादे पर ही जीती हैं कि वे राज्यों की सीमा में बदलाव लाएंगी और संविधान में जरूरी बदलाव करेंगी ताकि लंबे समय से उनके साथ हो रहा अन्याय समाप्त हो सके। इसलिए अब समय है कि वाम मोर्चा भी गंभीरता से विकास पर ध्यान दे कर काम करे और भौगोलिक-राजनीति में संतुलन कायम रखे ताकि काफी दिनों से आंदोलित मधेश सहित पूरे देश में सुख-शांति काठमांडू के बालुवाटार में 14 मार्च को प्रतिनिधि सभा, राष्ट्रीय सभा तथा प्रदेश सभा के सांसदों के सम्मान में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ओली ने फिर से स्पष्ट किया कि समय की मांग के अनुसार संविधान संशोधन किया जाएगा। साथ ही यह भी जोड़ा कि ऐसा संशोन नहीं होगा जो देश के लिए नुकसानदायक हो, देश की अखण्डता पर कोई आंच आए। लेकिन देश के लिए और भी मजबूती और एकता के लिए संशोधन किया जाएगा।

इन बयानों से जहां मधेशी दलों को सुकून पहुंचा होगा तो वहीं सशंकित भी होंगे कि न जाने भविष्य में सरकार क्या करेगी? क्यूंकि कथनी और करनी में फर्क सभी जानते हैं। फिलहाल देश के लिए सुकून की बात यह है कि नया संविधान जमीनी स्तर पर लागू हो रहा है। इन घटनाक्रमों से एक बात की और गुंजाईश बढ़ गयी है कि नेपाल अब राजनीतिक स्थिरता की ओर बढ़ चला है। और इसे बनाए रखने के लिए वर्तमान सरकार के समक्ष जबरदस्त चुनौतियां भी हैं तो संभावनाएं भी कम नहीं है। अब ओली सरकार को तय करना है कि वो किस प्रकार चुनौतियों पर काबू पाते हुए देश के विकास की संभावनाओं पर खरी उतरती है।

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