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‘हिन्दी’ को लेकर भाषाई विवाद कितना उचित

Nirbhay Karn
Nirbhay Karn

निर्भय कर्ण :

नेपाल में प्रदेश सभा का चुनाव संपन्न होने के बाद राज्यपाल की नियुक्ति कर दी गयी। राज्यपाल की नियुक्ति के बिना प्रदेशों में सरकार गठन में देरी हो रही थी। काफी नोंक-झांक के बाद अंततः राज्यपाल की नियुक्ति के साथ ही प्रदेशों में सरकार गठन का रास्ता साफ हो गया। और अब तक कुछेक प्रदेश छोड़कर अन्य प्रदेशों में पहली बैठक भी संपन्न हो चुकी है और मुख्यमंत्री चुनाव का कार्य जारी है। प्रदेश सभा के पहली बैठकों में प्रदेश-2 की बैठक काफी रोचक और चर्चित रहा।trendonixhindi1

प्रदेश 2 में 4 फरवरी को हुए इस बैठक के दौरान सदन में लोकतांत्रिक आंदोलन में हुए शहीदों की तस्वीर तो थी लेकिन मधेश आन्दोलन के शहीदों की तस्वीर मौजूद नहीं था, फिर क्या था। सदन में बवाल सा मचा और ऐसा बवाल मचा कि सदन कई बार अवरूद्ध हुआ। राजपा के मनीष कुमार सुमन, डॉ. डिम्पल झा सहित कई सदस्यों ने मधेश आंदोलन में शहीद हुए व्यक्तियों की तस्वीर सदन में रखने की मांग की। अन्ततः उन मांगों से संबंधित आदेश मिलने के बाद ही सदन दुबारा सुचारू रूप से चल पाया।

इस बैठक में संघीय समाजवादी फोरम के लालबाबू राउत, सावित्री देवी साह, राजपा के जितेन्द्र सोनल और स्वतंत्र सांसद शेख अब्दुल कलाम ने अपना भाषण हिन्दी में दिया। जबकि नेकपा एमाले के सांसद सत्यनारायण मंडल, शत्रुध्न महतो, नेपाली कांग्रेस के रामसरोज यादव, नेकपा माओवादी केन्द्र के भरत साह ने मैथिली में अपना मंतव्य दिया।

अभी यह हुआ ही था कि हिन्दी भाषा में भाषण देने वाले सांसद के विरूद्ध कुछ लोगों ने अपना मोर्चा खोल दिया। राजपा और फोरम के शीर्षस्थ नेता के पुतले व झंडा जलाकर अपना विरोध प्रदर्शन किया और तर्क दिया कि अपने ही देश में कोई विदेशी भाषा हिन्दी में क्यूं शपथ लें। यह गलत है। एक वर्ग का मानना था कि प्रदेश 2 मैथिली बहुल प्रदेश है ऐसे में यहां पर मैथिली भाषा की उपेक्षा हमें बर्दाश्त नहीं। प्रदेश का नाम मिथिला और कामकाज की भाषा मैथिली होना चाहिए।

इससे पहले 22 जनवरी को सभी 7 राज्यों के प्रतिनिधि सभा में नवनिर्वाचित सदस्यों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली। इस दौरान खास बात यह रही कि मधेशी बहुल आठ सीमावर्ती जिलों के दो नंबर प्रदेश के सांसदों ने 4 भाषाओं में शपथ ली। इसमें 83 सांसदों ने हिंदी, मैथिली और भोजपुरी में शपथ ली। बता दें कि नेपाल की राष्ट्रभाषा नेपाली है और वहां नेपाली भाषा में ही शपथ लेने की परंपरा है। लेकिन नवनिर्वाचित सांसदों ने नेपाली भाषा में शपथ ग्रहण करने से इनकार कर दिया। इसके बाद दो नंबर प्रदेश के सांसदों को अपनी मातृभाषा में शपथ ग्रहण करने दिया गया। कुल 107 सदस्यों ने शपथ ली जिसमें 46 लोगों ने मैथिली, 25 ने भोजपुरी, 11 ने हिंदी में शपथ ली, जबकि 23 सांसदों ने नेपाली भाषा में शपथ ग्रहण किया।

शपथ ग्रहण के बाद धनुषा के सीडीओ दिलीप कुमार ने सांसदों से आग्रह किया कि वे नेपाली भाषा में ही दस्तखत करें। लेकिन नवनिर्वाचित सांसदों ने उनकी सलाह न मानते हुए अपनी-अपनी मातृभाषा में ही हस्ताक्षर किया। सांसद जगत यादव ने कहा, ‘हमारा देश अब संघीय व्यवस्था वाला देश है, लेकिन सरकार अभी भी एकल भाषा को ही लेकर चल रही है’।

विदित हो कि भाशाई विवाद का मामला नेपाल के लिए यह पहली घटना नहीं है। 2008 में परमानंद झा द्वारा हिंदी में उपराष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद भी इस प्रकार का भाषाई विवाद उत्पन्न हुआ था। ज्ञात हो कि दक्षिण नेपाल के तराई इलाके से ताल्लुक रखने वाले झा ने जुलाई 2008 में उपराष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। शपथ ग्रहण समारोह में वह धोती और कुर्ता पहनकर पहुंचे थे, जबकि इसे नेपाली वेश नहीं माना जाता है। झा के शपथ लेने के अगले ही दिन एक वकील ने उनके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था। वैसे नेपाल में हिंदी फिल्मों का बड़ा बाजार है और लोग भी हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं, लेकिन इसे आधिकारिक भाषा नहीं माना जाता है।

प्रदेश 2 की राजधानी जनकपुर के जनक चौक पर युवा अभियान के संयोजक सुशील कर्ण की अगुवाई में यह विरोध आंदोलन का आयोजन किया गया था। सुशील कर्ण का कहना था कि हमारा आंदोलन हिन्दी भाषा के विरोध में नहीं है बल्कि हमारा आंदोलन सम्पर्क भाषा के नाम पर मातृभाषा की उपेक्षा करने के विरोध में है। यदि प्रदेश सभा में मौजूद दल इस विषय को गंभीरता से नहीं लिए तो आगे और भी कड़ा आंदोलन होगा।

गौर करें तो इस विरोध आंदोलन के पीछे किसी और साजिश की संभावनाएं नजर आती है। मैथिली को लेकर इस प्रदेश में कोई खासा विरोध नहीं था। लेकिन इसी मैथिली भाषा की आड़ लेकर कुछ लोग मैथिली, भोजपूरी और हिन्दी भाषियों को आपस में लड़ाकर प्रदेश नं. 2 के कामकाज की भाषा के रूप में अन्य भाषा को स्थापित करना चाहते हैं। इसलिए भाषाई विवाद को हवा दी जा रही है। यहां यह भी बताते चलें कि प्रदेश 2 में हिन्दी के अलावा मैथिली, भोजपुरी, मगही, थारू, बज्जिका, उर्दु भाषा बोलने वालों की संख्या भी कोई कम नहीं है। अभी कुछ दिन पहले ही नेपाल पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) महासंघ, धनुषा सहित लगभग 14 संघ-संस्थाओं ने मिलकर प्रदेश 2 के कामकाज की भाषा मगही में हो संबंधित ज्ञापन पत्र प्रदेश प्रमुख रतनेश्वर लाल कायस्थ को सौंपा था।

विश्लेषक सी. के. हाल ने भी हाल के दिनों में यह माना था कि मधेश की संपर्क भाषा नेपाली नहीं बल्कि हिन्दी है। पूरे मधेश की ही संपर्क भाषा हिन्दी है। मधेश और पहाड़ को जोड़ने वाली भी भाषा हिन्दी ही है।

वहीं सामाजिक कार्यकर्ता सरोज राय का मानना है कि ‘‘हिन्दी केवल मधेश की भाषा नहीं है बल्कि देश भर में हिन्दी संपर्क भाषा  के रूप में सबसे लोकप्रिय भाषा है। और मुझे अच्छी तरह पता है कि हिन्दी बोलने से मेरे स्वाभिमान, आत्मसम्मान और देशभक्ति में कोई आंच आने वाला नहीं है।’’

यह भी सत्य है कि लोकतंत्र में सबके लिए भाषा संरक्षण का अधिकार है। फिलहाल प्रदेश 2 के नाम और यहां की कामकाज की भाषा पर सभी दल एकमत नहीं है और मैथिली भाषा को लेकर खासा दबाव है। ऐसे में प्रदेश प्रमुख और विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच इसे लेकर क्या सहमति बनती है, यह देखने वाली बात होगी।

यह सभी को समझना होगा कि कोई भी भाषा किसी भी समाज व समुदाय को जोड़ने का काम करती है न कि उसे तोड़ने का। और किसी भी भाषा का प्रयोग करने का मतलब यह नहीं है कि वो अपना समाज, अपनी संस्कृति और देश को भूल गए, इसलिए इस विषय पर विवाद करना फिजूल है। साथ ही भाषा विकास की रास्ता को खोलती है न कि उसमें अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए प्रदेश 2 में कामकाज की भाषा के रूप में हिन्दी, मैथिली और भोजपुरी को स्थान देना चाहिए। और ऐसा संविधान में भी प्रावधान है कि प्रदेश में एक या एक से अधिक भाषा बोलने वाली जनसंख्या यदि अधिक है तो प्रदेश के कामकाज की भाषा उसे बनायी जा सकती है।

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