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Abki bar Baam sarkar

अब की बार वाम सरकार

Nirbhay Karn
Nirbhay Karn

निर्भय कर्ण ::                                Abki bar Baam sarkar

लोकसभा चुनाव, 2014 में नरेंद्र मोदी ने एक बड़े नारा ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के साथ पूरे भारत में कांग्रेस पर सुनामी आरोप के साथ इस चुनाव को जीत लिया था। एक तरह से पूरे देश से ही कांग्रेस का सफाया कर दिया। कुछ इसी तर्ज पर भारत का पड़ोसी देश आखिर नेपाल भी नरेंद्र मोदी के फार्मूला को कैसे न भूनाता। इसी बात को ध्यान में रखते हुए नेपाल में वामगठबंधन हो गया और संसदीय चुनाव हो या फिर प्रांतीय चुनाव में लगभग दोनों स्तर के चुनाव में वामगठबंधन ने नेपाल को ‘कांग्रेस मुक्त नेपाल’ बना दिया। यह निश्चित हो चुका है कि केंद्र में सरकार बनेगी तो वो वामगठबंधन का ही होगा। और प्रदेश में भी प्रदेश 2 की बात छोड़ दें तो बांकि प्रदेशों में भी वाम गठबंधन की ही सरकार बनने जा रही है। ऐसे आश्चर्यजनक परिणामों को लेकर सभी के जेहन में यह जरूर होगा कि आखिर वाम गठबंधन को प्रत्यक्ष चुनाव में इतनी ज्यादा सीटें कैसे मिल गयी और कांग्रेस ने ऐसी क्या गलती कि जिससे वो तीसरे पायदान पर जा पहूंची? हालांकि समानुपातिक वोटों ने कांग्रेस की लाज बचा लिया और इन वोटों के चलते कांग्रेस दूसरे स्थान पर पहुंचने में सफल रही।

चुनावी परिणामPratinidhi sabha reuslt

संसदीय सीटों के अंतर्गत प्रत्यक्ष रूप से नेकपा एमाले को 80, नेकपा माओवाादी को 36 कांग्रेस को 23, राष्ट्रीय जनता पार्टी, नेपाल को 11, संघीय समाजवादी फोरम, नेपाल को 10 सीटों पर विजय मिली। और यही पांचों पार्टियां अब राष्ट्रीय पार्टी बनी है जबकि अन्य पार्टियों को राष्ट्रीय पार्टी से हाथ धोना पड़ा है। वहीं संसदीय सभा के लिए 95,44,741 समानुपातिक वोटों का परिणाम कुछ इस तरह रहा:- नेकपा एमाले-31,73,494, नेपाली कांग्रेस-31,28,389, माओवादी केन्द्र- 13,03,721, संघीय समाजवादी फोरम-4,72,254, राजपा-4,70,201, अन्य-9, 96,685 ।

यहां बताते चलें कि संसदीय सभा के लिए 165 सांसद प्रत्यक्ष रूप से जीत चुके हैं जबकि इसी के लिए 110 सांसदों का चयन समानुपातिक वोटों के आधार पर होना है। संसद के उच्च सदन यानी राष्ट्रीय सभा में कुल 59 सीटें हैं, जिनमें से तीन सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करेंगे, जबकि बाकी सीटों का निर्वाचन सात प्रांतों से होगा। जिसमें छह प्रांतों में भी कम्युनिस्ट गठबंधन ने जीत दर्ज की है।

इसी प्रकार प्रदेश सभा के लिए कुल 330 विधायक प्रत्यक्ष रूप से चुनाव जीत चुके हैं जबकि 220 विधायकों का चयन समानुपातिक वोटों के आधार पर होना है। प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव परिणाम कुछ इस तरह रहे। प्रदेश 1 में एमाले को 15, नेपाली कांग्रेस को 15, नेकपा माओवादी केंद्र को 5, संघीय समाजवादी फोरम को 3, राजपा को 1 सीट प्राप्त हुआ। वहीं प्रदेश 2 में एमाले को 7, नेपाली कांग्रेस को 11, नेकपा माओवादी केंद्र को 5, संघीय समाजवादी फोरम को 9, राजपा को 10 सीटें मिला।

प्रदेश 3 में एमाले को 16, नेपाली कांग्रेस को 14, नेकपा माओवादी केंद्र को 8, विवेकशील साझा पार्टी को 3, राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी को 1, नेपाल मजदूर किसान पार्टी को 1 सीट पर विजय प्राप्त हुआ। वहीं प्रदेश 4 में एमाले को 10, नेपाली कांग्रेस को 9, नेकपा माओवादी केंद्र को 3, नया शक्ति को 1, राष्ट्रीय जनमाोर्चा को 1 सीट पर जीत दर्ज हुआ।

जबकि प्रदेश 5 में एमाले को 13, नेपाली कांग्रेस को 12, नेकपा माओवादी केंद्र को 6, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को 1 सीट प्राप्त हुआ। वहीं प्रदेश 6 में एमाले को 6, नेपाली कांग्रेस को 5, नेकपा माओवादी केंद्र को 4, राजपा को 1 सीट मिला। उधर, प्रदेश 7 में एमाले को 8, नेपाली कांग्रेस को 8, नेकपा माओवादी केंद्र को 4, राजपा को 1 सीट पर विजय प्राप्त हुआ।

संघीय संसद के निचले सदन और नई प्रांतीय विधानसभाओं के लिए 26 नवंबर और 7 दिसंबर, 2017 को चुनाव कराये गए थे। सात प्रांतों का सीमांकन तो हो गया है लेकिन उनके नाम तय किया जाना अभी बाकी है। इन प्रान्तों की राजधानियां भी अब तक निर्धारित नहीं है। कुल मिलाकर, यह जनादेश नेपाल की राजनीति को स्थिरता दे सकती है बशर्ते की माओवादी केन्द्र एमाले के साथ अपना गठजोड़ बनाए रख सके। वैसे अभी तक दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां कह रही है कि वे आपस में जल्द ही विलय कर लेंगी। हालांकि विलय पर अमल करना उतना ही कठिन है। इन दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच सैद्धांतिक दरारों को भरना उतना आसान नहीं है। इन दोनों पार्टियों के प्रमुख सक्षम नेता हैं या तो ये आपस में मिलकर एक मजबूत सरकार दे सकते हैं या फिर उनमें टकराव हुआ, तो देश राजनीतिक अस्थिरता की ओर बढ़ जाएगा।

वाम गठबंधन की सफलता के कारकों पर एक नजर:-

नाकेबंदी:– गौर करें तो नेपाल में पिछले साल हुए आंदोलन के दौरान हुए नाकाबंदी का सीधा-सीधा आरोप भारत पर लगा था। यह नाकेबंदी करीब छः महीने तक रहा। इस नाकेबंदी का असर इतना व्यापक था कि नेपाल के पहाड़, हिमाल से लेकर तराई तक को मुसीबत झेलनी पड़ी। उस समय एमाले के सुप्रीमों के पी ओली ने भारत पर जमकर आरोप लगाया था और जनता में राष्ट्रवाद की भावना को जगाया। इसका असर यह हुआ कि उस समय जो भी भारत के खिलाफ आग उगलता था, वह सच्चा राष्ट्रभक्त कहलाने लगा और जो भारत के साथ था, उसे देशद्रोह की संज्ञा दी जाने लगी। इतना ही नहीं के पी ओली ने मधेशी के खिलाफ जमकर आग उगला और अंत तक संविधान संशोधन नहीं होने दिया। इससे ओली की छवि पहाड़ और हिमाल में काफी चमका और लोगों को लगा कि के पी ओली ही एक ऐसा व्यक्ति है जो मधेश पर पकड़ बनाए रख सकता है। एमाले ने इसी भावना को वोट बैंक में तब्दील करवाने में सफलता हासिल कर ली।

कांग्रेस का मधेश के प्रति ढुलमूल रवैया:- के पी ओली के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद कांग्रेस और माओवादी केंद्र के आपसी समर्थन से प्रचंड प्रधानमंत्री बने और इसके बाद कांग्रेस के सभापति शेर बहादुर देउवा। इस दौरान मधेश समर्थित संविधान संशोधन करवाने में कांग्रेस असफल रही। मधेशी दलों ने यह महसूस किया कि कांगे्रस के ढुलमूल रवैया के कारण ही यह संशोधन नहीं हो सका। यह तो हुयी तराई क्षेत्रों की स्थिति। दूसरी तरफ पहाड़ और हिमाल में भी कांग्रेस का मधेश के प्रति ढुलमूल रवैया के कारण यहां की जनता कांग्रेस को समझ नहीं पायी जिसके कारण कांग्रेस के छवि को यहां नुकसान पहुंचा और यही वजह रहा कि कांग्रेस को इस चुनाव में दूसरे पायदान पर जाना पड़ा।

टिकटों का बंटवारा – वामगठबंधन ने बड़ी चतुराई से सीटों के बांट-फांट को अंजाम दिया। हालांकि इसमें भी सीटों को लेकर थोड़ा-बहुत हंगामा हुआ। लेकिन कांग्रेस में सीटों के पक्षपाती बांट-फांट का इतना व्यापक असर हुआ कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को भी हार का स्वाद चखना पड़ा जैसे रमेश लेखक, रामचंद्र पाडेल, कृष्ण प्रसाद सितौला, बिमलेंद्र निधि, गोपाल मानश्रेष्ठ भी हैं।

गुटबाजी ने कांग्रेस की हालत और भी पतली करके रख दिया। उधर मधेशी दलों के साथ भी कांग्रेस सभी सीटों पर अंत तक तालमेल नहीं कर सकी। जिसके कारण कांग्रेस को मधेश में भी कुछ खास हासिल नहीं हो पाया।

भारत और चीन के रिश्तों पर असर

ज्ञात हो कि नेपाल को लेकर सभी पड़ोसी देशों सहित अमेरिका तक यहां की गतिविधियों में जबरदस्त दिलचस्पी लेता है। खासकर भारत और चीन की नजर नेपाल पर हमेशा ही टिकी रहती है। नेपाल में हुए चुनावी परिणामों को देखें तो ऐसा लगता है कि कम्युनिस्ट चीन नेपाल में कम्युनिस्ट सरकार बनवाने में सफल हो रही है। उसका पैंतरा भारत को पछाड़ते हुए नेपाल में काम कर गया। यही वजह है लोकतांत्रिक देश भारत नेपाल में लोकतांत्रिक सरकार बनवाने में असफल साबित हो रही है। उसका हर पैंतरा चीन के पैंतरे के सामने कमजोर पड़ गया।
के पी ओली के नेपाल के नए प्रधानमंत्री के तौर पर जल्द शपथ लेने की उम्मीद है। ऐसे में बराबरी और पारस्परिक सम्मान के आधार पर भारत-नेपाल संबंधों का नया प्रतिमान तैयार करने की जरूरत है। निहित स्वार्थों के कारण कुछ ताकतें तुच्छ मु्द्दों को उठाकर नई दिल्ली और काठमांडू के बीच वैचारिक विभाजन पैदा करने की कोशिश करती रहती हैं। नेपाल की नई सरकार के साथ सहज संबंध बनाकर नरेंद्र मोदी सरकार को ऐसी ताकतों को शुरुआत में ही बढ़ने नहीं देना चाहिए। हालांकि एमाले महासचिव ईश्वर पोखरेल ने कहा है कि नेपाल का वामपंथी गठबंधन ना तो भारत विरोधी और ना ही चीन समर्थक होगा। लेकिन यह दोनों देशों के साथ अच्छे संबंध कायम रखेगा। दोनों देश (भारत और चीन) हमारे पड़ोसी हैं और हम दोनों पड़ोसियों का सम्मान करते हैं। भारत हमारा पड़ोसी है। कोई नेपाली भारत विरोधी नहीं होगा।
नेपाल की नई सरकार के साथ भारत को खुले और व्यावहारिक सोच के साथ बढ़ने की जरूरत है। चुनाव में वाम गठबंधन की जीत को कई लोग चीन का दखल बढ़ने के तौर पर देख रहे हैं। ऐसे में भारत को अपनी नीति में बदलाव करके शीर्ष स्तर पर नए सिरे से ओली और नेपाल की नई सरकार के साथ संबंधों को सुनिश्चित करना होगा। भारत की प्राथमिकता नाकेबंदी की भ्रामक धारणाओं को पीछे छोड़ना और चिंताएं कम करना होनी चाहिए। इसके साथ ही आनेवाली सरकार को मधेश आंदोलन का मान रखते हुए संविधान संशोधन जैसे संवेदनशील मुद्दों को निपटाकर देश में शांति, विकास और स्थिरता की ओर कदम बढ़ाना, सरकार के प्रमुख एजेंडों में शामिल करना चाहिए।

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