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5 साल के कार्यकाल को पूरा करने में नेपाली प्रधानमंत्री अब तक नाकाम

Nepali-prime-ministersनिर्भय कर्ण :

Nirbhay Karn
Nirbhay Karn

              नेपाल के प्रधानमंत्री के अधिकृत वेबसाइट पर वि. सं. 1863 से लेकर अब तक हुए प्रधानमंत्री की सूची उपलब्ध है। इसके मुताबिक, कांग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा के रूप में नेपाल को 40वां प्रधानमंत्री मिला है। इन सूची पर गौर करें तो पाएंगे कि 1990 ई. (वि. सं. 2047) से पूर्व जो भी प्रधानमंत्री हुए हैं उनमें कुछ तो दशकों तक भी प्रधानमंत्री पद पर राज किया तो कई काफी कम अवधि तक ही इस पद को सुशोभित करते रहे। लेकिन 1990 ई. (वि.सं. 2047) के बाद की स्थिति बेहद ही भयावह है।5 साल के कार्यकाल को पूरा करने में नेपाली प्रधानमंत्री अब तक नाकाम

             स्थिति देखने के बाद आप यह कह उठेंगे कि लोकतंत्र और गणतंत्र का उदाहरण देखना है तो नेपाल को ले लीजिए। जी हां, नेपाल को 1990 के बाद यानि कि 26 वर्षों में 25वां प्रधानमंत्री कांग्रेस के सभापति शेर बहादुर देउवा के रूप में मिला है। गणितीय हिसाब से आकलन किया जाए तो देश को औसतन लगभग हर साल एक प्रधानमंत्री मिलता है। जबकि यहां भी प्रधानमंत्री का कार्यकाल 5 साल का ही होता है। नेपाल के लिए यह दुर्भाग्य ही कहा जाए कि 1990 ई. के बाद एक भी प्रधानमंत्री अब तक पांच साल के कार्यकाल को पूरा नहीं कर पाया। जो नेपाल के लोकतंत्र और गणतंत्र पर सवालिया निशान लगाता है। आखिर वजहें क्या है जो नेपाल में इतनी जल्दी सरकार बदल जाती हैं।

इसका सीधा और सपाट सा उत्तर है कि यहां राजनीतिक अस्थिरता और स्वार्थ की पराकाष्ठा इस कदर हावी है कि कोई भी प्रधानमंत्री पांच साल के कार्यकाल को पूरा नहीं कर पाते। यहां पर वि.सं. 2046 यानि 1989 ई. में जनआंदोलन के बाद 1990-1991 ई. में जब कृष्ण प्रसाद भट्टराई की अंतरिम सरकार बनी तब से लेकर आज तक नेपाल में राजनीति अस्थिर ही रहा है। और एकाध अपवाद को छोड़कर किसी भी दल को कभी भी पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। और कभी कभार जिसे बहुमत मिला भी वो भी राजनीतिक उथल-पुथल के कारण अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी और देश को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा। निष्कर्षतः सत्ता की चाहत और आपसी झगड़े ही इन सबकी जड़ रहा है। यहां हम एक-एक करके प्रत्येक के प्रधानमंत्री कार्यकाल के बारे में बता रहे हैं जिससे आपको स्पष्ट हो जाएगा कि आखिर यहां सरकारें इतनी जल्दी क्यूं बदल जाती है।

  1. कृष्ण प्रसाद भट्टराई – 1989 ई. के जनांदोलन के बाद अंतरिम सरकार का गठन हुआ। जब तक संसद का चुनाव नहीं हुआ तब तक भट्टराई प्रधानमंत्री पद पर बने रहे। कुल मिलाकर वो 13 महीने तक ही सरकार चला पाये। फिर 1991 ई. (वि.सं. 2048) में संसदीय चुनाव हुआ।
  2. गिरिजा प्रसाद कोईराला:- 1991 ई. में हुए आम चुनाव में कांग्रेस ने 205 सीटों में से 110 सीटों पर कब्जा किया और इस प्रकार कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। और अन्य कुछ स्वतंत्र सांसद के साथ मिलकर गिरिजा प्रसाद कोईराला ने नयी सरकार का गठन किया। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाए कि गिरिजा प्रसाद कोईराला की नीति तथा कार्यक्रम के लिए हुए वोटिंग में उनके अपने सांसदों ने ही उन्हें वोट नहीं किया और अंततः कोईराला सरकार संसद में फेल हो गयी। इसका परिणाम यह हुआ कि 10 जुलाई, 1994 ई. (वि.सं. 2051 आषाढ 26 गते) में सरकार ढल गयी और देश को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा।
  3. मनमोहन अधिकारी:- मध्यावधि चुनाव में 205 सीटों में से 88 सीट जीतने वाली एमाले दिसंबर, 1994 (वि.सं. 2051 के मंसिर) में अल्पमत सरकार बनाने में सफल रही। लेकिन यह सरकार ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकी और अंततः 10 सितंबर, 1995 (वि.सं. 2052 भादौ 25 गते) को मनमोहन अधिकारी नेतृत्व वाली सरकार गिर गयी।
  4. शेर बहादुर देउवा:- राप्रपा, सद्भावना और स्वतंत्र सांसदों के समर्थन से कांग्रेस नेता शेर बहादुर देउवा प्रधानमंत्री बने। देउवा के विरूद्ध एमाले ने प्रस्ताव पारित कराया जिसमें कांग्रेस के भक्त बहादुर बलाएर और अर्जुन जंग बहादुर शाह ने नाटकीय रूप से साथ दे दिया। परिणामतः देउवा सरकार मार्च, 1997 (वि.सं. 2053 के फागुन) में ढल गयी।
  5. लोकेन्द्र बहादुर चन्द:- राप्रपा को प्रधानमंत्री पद देने की शर्त पर एमाले ने राप्रपा के सहयोग से लोकेन्द्र बहादुर चन्द को मार्च, 1997 में प्रधानमंत्री पद दिया। जबकि राप्रपा के कुल 19 सांसद ही थे जिसमें से इसी गुट के लोकेन्द्र बहादुर चन्द के 8 सांसद भी शामिल थे। वामदेव गौतम उपप्रधानमंत्री बने। लेकिन कांग्रेस ने राप्रपा के थापा समुह के साथ मिलकर 1997 के अक्टूबर (वि.सं. 2054 के असोज) में सरकार गिराने में सफल हो गए।
  6. सूर्य बहादुर थापा:- सूर्य बहादुर थापा के साथ राप्रपा के कुल 11 सांसद थे। लेकिन कांग्रेस, सद्भावना और स्वतंत्र के साथ मिलकर सूर्य बहादुर थापा ने सरकार बना लिया। लेकिन प्रमुख सहयोगी कांग्रेस के असहयोग के बाद थापा को मजबूरन अप्रैल, 1998 (वि.सं. 2054 के चैत) में इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद 88 सीट वाली एमाले, लोकेन्द्र बहादुर चन्द के 8 सीट, 83 सीट वाली कांग्रेस और 11 सीट वाली थापा ने बारी-बारी से अपनी-अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री बनाए जाने की षर्त पर नए सरकार का गठन किया।
  7. गिरिजा प्रसाद कोईराला:- थापा से समर्थन वापस लेकर कांग्रेस के गिरिजा प्रसाद कोईराला प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। उनके साथ स्पष्ट बहुमत था। लेकिन तब तक एमाले आपस में फूट चुकी थी। वामदेव गौतम नेतृत्व वाली नेकपा माले के समर्थन से राधाकृष्ण मैनाली सरकार में गए और इस प्रकार 12 अप्रैल 1998 (वि.सं.2054 चैत 30 गते) को कोईराला प्रधानमंत्री बन सके। लेकिन वामदेव की पार्टी के साथ गिरिजा प्रसाद कोईराला की सहमति लंबे समय तक टिक नहीं सका और अंततः 22 दिसंबर, 1998 (वि.सं.2055 के पुस 7 गते) को माले द्वारा सरकार से बाहर जाने के बाद सरकार गिर गयी।
  8. गिरिजा प्रसाद कोईराला:- वामदेव गौतम के नेतृत्व वाली माले के समर्थन वापसी के बाद माधव नेपाल के नेतृत्व वाली नेकपा एमाले तत्काल समर्थन देने के लिए तैयार हो गयी। राजीनामा देने के 24 घण्टे के अंदर ही 23 दिसंबर, 1998 को (वि.सं. 2055 के पुस 8 गते) गिरिजा प्रसाद कोईराला फिर प्रधानमंत्री बन गए। और कांग्रेस को बहुमत दिलवाने और कृश्ण प्रसाद भट्टराई को प्रधानमंत्री बनाने की प्रतिबद्धता के साथ कोईराला ने चुनाव कराने की घोषणा की।
  9. कृष्ण प्रसाद भट्टराई:– इस चुनाव में फिर एक बार कांग्रेस ने 111 सीट के साथ स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। और कांग्रेस के भीतर ही हुए पूर्व सहमति के अनुसार भट्टराई 27 मई, 1999 (वि.सं. 2056 जेठ 13 गते) को प्रधानमंत्री बने। लेकिन कोईराला एक वर्ष तक भी धैर्य नहीं रख सके। अंततः कृष्ण प्रसाद भट्टराई ने रेडियो नेपाल पर पांच मिनट का भावुक भाषण देकर 19 मार्च, 2000 (वि.सं.2056 चैत 6 गते) को अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
  10. गिरिजा प्रसाद कोईराला:– भट्टराई के इस्तीफा देने के बाद 20 मार्च, 2000 (वि.सं. 2056 चैत 7 गते) को गिरिजा प्रसाद कोईराला फिर प्रधानमंत्री बने। लेकिन उनके विपक्षी का अपने पार्टी के अंदर ही अहयोग था। इसी बीच रोल्पा के होलेरी में माओवादी द्वारा आक्रमण के बाद गिरिजा ने सेना परिचालन की अपनी इच्छा जाहिर की लेकिन दरबार द्वारा इंकार किए जाने के बाद कोईराला ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
  11. शेर बहादुर देउवा:- गिरिजा प्रसाद के राजीनामा देने के तुरंत बाद ही कांग्रेस के शेर बहादुर देउवा जुलाई, 2001 (वि.सं. 2058 के साउन) में प्रधानमंत्री बनाए गए। उनके अपनी ही पार्टी यानि कांग्रेस के भीतर ही उलझनें थी। माओवादी विरूद्ध लगाए गए संकटकाल को पारित कराने हेतु पहले छह महीने के लिए एमाले ने समर्थन किया था। लेकिन दूसरी बार छः महीने का समय बढ़ाने के लिए एमाले ने कांग्रेस का समर्थन नहीं किया। प्रस्ताव विफल होने के बाद देउवा ने कांग्रेस प्रजातान्त्रिक नाम से नया दल खोलकर नए चुनाव की घोषणा कर दी। लेकिन माओवादी के कारण घोषित चुनाव नहीं होने के बाद राजा ज्ञानेन्द्र ने 4 अक्टूबर 2002 (वि.सं.2059 असोज 18 गते) को शेर बहादुर देउवा को उसके पद से हटा दिया।
  12. लोकेन्द्र बहादुर चन्द:- राजा ज्ञानेन्द्र ने देउवा को अक्षम घोषित कर लोकेन्द्र बहादुर चन्द को नया प्रधानमंत्री बनाया। और माओवादी के साथ वार्ता करने की जिम्मेवारी लोकेन्द्र को सौंपी। लेकिन संविधान सभा चुनाव की मांग करने वाली माओवादी के एजेन्डा का समर्थन करने का अधिकार लोकेन्द्र के पास था ही नहीं। शान्ति और वार्ता में प्रगति नहीं होने के कारण लोकेन्द्र बहादुर चन्द को भी आखिर में मई-जून, 2003 (वि.सं. 2060 के जेठ) में राजा ने उसे पदच्यूत कर दिया।
  13. सूर्य बहादुर थापा:- माओवादी के साथ वार्ता करने का जिम्मा अब राजा ने सूर्य बहादुर थापा को सौंपा। चन्द के समय भी इसमें प्रगति नहीं हो सका था। यथार्थ यह कि अपने द्वारा बनाए गए दोनों प्रधानमंत्री की असफलता के बाद राजा ने थापा को हटाकर मई-जून, 2004 (वि.सं. 2061 के जेठ) में प्रधानमंत्री पद के लिए खुले रूप में आहावन किया।
  14. शेर बहादुर देउवा:- प्रधानमंत्री पद के लिए एमाले के माधव नेपाल से लेकर लक्ष्मण सिंह खड़का तक दरबार में अपना आवेदन पेश किया। लेकिन राजा ने कांग्रेस प्रजातांत्रिक के सभापति शेर बहादुर देउवा द्वारा आवेदन पेष नहीं करने के बाद भी देउवा को प्रधानमंत्री पद दे दिया। 11 जून 2004 (29 जेठ वि.सं. 2061) को ज्ञानेन्द्र द्वारा बनाए गए प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउवा को 8 महीने बाद 24 जनवरी, 2005 (11 माघ वि.सं. 2061) को पद से हटा दिया और खुद अपने हाथों सत्ता का कमांड ले लिया।
  15. ज्ञानेन्द्र शाह:- शान्ति स्थापित करने में विफल रहने के बाद शेर बहादुर देउवा को दूसरी बार प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया और खुद राजा ज्ञानेन्द्र षाह मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष बन गए। लेकिन राजनीतिक दल और विद्रोही माओवादी द्वारा दिल्ली में 12 बुँदे समझौता के बाद नेपाल में आंदोलन हुआ और अंततः ज्ञानेन्द्र के मंत्रिपरिषद सहित 240 वर्श लंबे राजसंस्था का अंत हो गया।
  16. गिरिजा प्रसाद कोईराला:- 2005-06 (वि.सं. 2062-63) के सफल जन आंदोलन के बाद एक बार फिर गिरिजा प्रसाद कोईराला प्रधानमंत्री पद पर विराजमान हुए। इनके साथ माओवादी भी सरकार में शामिल हुयी। मार्च, 2008 (वि.सं. 2064 के चैत) में हुए चुनाव में पराजय के बाद अगस्त, 2008 में कोईराला ने सत्ता छोड़ दिया।
  17. प्रचण्ड:- संविधान सभा के पहले निर्वाचन के बाद सभी बड़े दल एमाले और मधेशी के समर्थन से तत्कालीन माओवादी अध्यक्ष प्रचंड ने अपनी सरकार बनायी। लेकिन प्रधान सेनापति के बर्खास्तगी के सरकार के निर्णय को राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया, फलस्वरूप प्रचंड ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
  18. माधव कुमार नेपाल:- प्रचंड के राजीनामा देने के बाद कांग्रेस और अन्य दलों के समर्थन से तीसरा दल के एमाले नेता माधव कुमार नेपाल ने सत्ता की बागडोर संभाली। विपक्षी माओवादी के लगातार असहयोग और आंदोलन के एक वर्ष बाद आखिर में माधव कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन असार से माघ माह तक संसद में नए प्रधानमंत्री के लिए 17 बार चुनाव हुए। इसके बावजूद एमाले की ‘नो वोट’ नीति रहने की वजह से देश को सात महीने तक कामचलाउ सरकार से काम चलाना पड़ा।
  19. झलनाथ खनाल:- माओवादी और एमाले के बीच आलो-पालो प्रणाली के तहत 6-6 महीने सरकार चलाने की सहमति के बाद जनवरी, 2011 (वि.सं. 2067 के माघ) में झलनाथ खनाल प्रधानमंत्री बने। लेकिन सरकार से बाहर आने का दबाव झलनाथ खनाल पर एमाले के माधव नेपाल और ओली समूह द्वारा लगातार दिया जा रहा था। अंततः विवादों के बीच खनाल ने अगस्त, 2011 (वि.सं. भादौ 2068) को अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। कांग्रेस और माओवाद के बीच विवादों के दौरान तीसरा दल एमाले ने दो-दो बार प्रधानमंत्री पद का स्वाद चखा।
  20. बाबुराम भट्टराई:– मधेशी के समर्थन से एमाओवादी नेता डॉ. बाबुराम भट्टराई प्रधानमंत्री पद पर 29 अगस्त, 2011 को काबिज हुए। लेकिन उनके पार्टी के अंदर ही वैद्य समूह खुले रूप से उनका विरोध करते रहे। भट्टराई सरकार ने अंततः 13 मार्च, 2013 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
  21. खिलराज रेग्मी:- कोई भी दल किसी भी दल का नेतृत्व स्वीकार नहीं करने की स्थिति में प्रधान न्यायाधीश खिलराज रेग्मी के नेतृत्व में पूर्व कर्मचारी को मंत्री पद देकर चुनावी सरकार का गठन किया गया।
  22. सुशील कोईराला:– इस चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हो सका। संविधान सभा के दूसरे निर्वाचन के बाद एमाले के समर्थन से कांग्रेस के सभापति सुशील कोईराला प्रधानमंत्री बने। अंततः 20 सितंबर, 2015 (वि.सं. 03 असोज 2072) को संविधान जारी हुआ। इसी के साथ सुशील कोईराला को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।
  23. के.पी. ओली:- संविधान जारी होते ही सुशील कोईराला के इस्तीफा देने के बाद माओवादी के समर्थन से एमाले के मुखिया के. पी. ओली ने 11 अक्टूबर, 2015 (वि.सं. 24 असोज 2072) को प्रधानमंत्री पद संभाला। लेकिन माओवादी और एमाले के बीच यह विश्वास ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सका और अंततः के. पी. ओली को अपने पद से 24 जुलाई, 2016 (वि.सं. 09 साउन 2073) को इस्तीफा देना पड़ा।
  24. प्रचण्ड:- ओली के इस्तीफा के बाद माओवादी और कांग्रेस के बीच सहमति बनी कि 9-9 महीने दोनों दलों के प्रधानमंत्री होंगे। इस सहमति के तहत प्रचण्ड को प्रधानमंत्री पद 3 अगस्त, 2016 (वि.सं. 19 साउन, 2073) को मिल गया। इस दौरान पहले चरण का स्थानीय चुनाव करा लिया गया। और इस चुनाव को बाद सहमति के अनुसार, प्रचण्ड ने 23 मई, 2017 को प्रधानमंत्री पद छोड़ दिया।
  25. शेर बहादुर देउवा:- इस प्रकार 06 जून, 2017 को कांग्रेस के सभापति शेर बहादुर देउवा प्रधानमंत्री पद पर निर्वाचित हुए। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या संसदीय चुनाव से पहले एक बार फिर नेपाल को एक नया प्रधानमंत्री देश को मिलेगा या फिर देउवा ही अगले चुनाव तक इस पद पर बने रहेंगे। वैसे शेर बहादुर देउवा के सामने भी कई सारी चुनौतियां विद्यमान है। ऐसे में देउवा इन चुनौतियों से कैसे पार पाते हुए दूसरे चरण का स्थानीय चुनाव, प्रदेश चुनाव व संसदीय चुनाव करा पाते हैं, कहना अभी मुश्किल है।

 

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