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सुनिश्चित करें बुजुर्गों की खुशहाल जिंदगी

(अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस-1 अक्टूबर के मौके पर) सुनिश्चित करें बुजुर्गों की खुशहाल जिंदगी निर्भय कुमार कर्ण मां-बाप अपने बच्चों की परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ते। अपनी इच्छाओं को मन में ही दफन कर बच्चों की खुशियों के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं क्यूंकि उन्हें यह उम्मीद होती है ...

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कानून की खामियों का नाजायज फायदा

निर्भय कर्ण   संविधान बनने की प्रक्रिया को लेकर अभी नेपाल लगातार संघर्षशील था ही कि इसी बीच महाभूकंप ने इसे बूरी तरीके से हिलाकर रख दिया। चूंकि संविधान बनने की संभावना क्षीण होती जा रही थी फिर भी आम जनता को यह भरोसा था कि संविधान बन जाने से काफी ...

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अंबेडकर को समझने कि चुनौती

किसी महापुरुष के बारे में पढ़ने- पढ़ाने, लिखने और व्याख्यान करने का यह मतलब नहीं कि उसके बारे में समझ पैदा हो सके। यह बाबा साहब डाॅ. अंबेडकर की 125वीं वर्षगांठ है, जिसको न केवल दलित मना रहे हैं बल्कि पूरी भारत सरकार। देश के सामने तो चुनौती है ही ...

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शिक्षा व्यवस्था कहां फेल हुई

एक बहुत घातक प्रवृत्ति पैदा हो गयी है कि हर कमी के लिए राजनीतिज्ञ जिम्मेदार ठहराए जा रहे हैं, उसके बाद पुलिस और नौकरशाही। रंगभेद, घरेलू हिंसा, सिविल सोसाइटी के असंवैधानिक कृत्य आदि के लिए भी सबसे पहले राजनीति ही जिम्मेदार ठहराई जाती है। निर्भया कांड जब हुआ तो पूरा ...

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जाति अभी गयी नहीं

शिक्षित लोगों में जब चर्चा होती है तो ज्यादातर लोग यह कहते हैं कि जाति तो बीते दिनों की बात हो गयी है। हाल में हरियाणा में आरक्षण के आंदोलन ने इसका जवाब दे दिया कि जाति सबसे बड़ी सच्चाई है। लोग सब कुछ खो सकते हैं, लेकिन जाति नहीं। ...

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