Breaking News
Home / अंतरराष्ट्रीय समाचार / विकास का दूसरा नाम विनाश तो नहीं?
nijgadh 11.jpg66

विकास का दूसरा नाम विनाश तो नहीं?

Raksha Choudhary
Raksha Choudhary

रक्षा कुमारी चौधरी :

जीवन के लिए पेड़ कितना जरूरी है, यह सब जानते हें। हम इंसान नहीं हैं जो सब कुछ समझते हुए भी अपने जीवन को विनाश के कगार पर पहुंचाने हेतु उतारू हैं और नाम दे देते हैं विकास का। ताजा घटना नेपाल के बारा जिला स्थित निजगढ़ का है जहां अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनना प्रस्तावित है। इसके निर्माण के लिए वातावरण अध्ययन प्रतिवेदन के अनुसार एक लाख 95 हजार बड़े पेड़ काटना होगा जबकि छोटे पेड़-पौधों और झाड़ियों की संख्या 5 लाख 75 हजार तक पहुंच जाएगी। जिसके लिए एक पक्ष तो लगभग तैयार है जबकि दूसरा पक्ष यानि वातावरण व जीव-जन्तु प्रेमी और चिंतक इसे लेकर अपनी आवाज को प्रखर कर चुके हैं। सामाजिक संजाल में जब यह खबर वायरल होने लगी, तो इसे रोकने के लिए देश के कोने-कोने से आवाज उठने लगी है। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा निर्माण किस काम का जो पूरी तरह वातावरण को असंतुलित कर लोगों के भविष्य को बर्बाद करने पर आमादा है?

nijgadh.jpeg1
नेपाल में ‘हरियो वन-नेपालको धन’ यानि की हरा वन नेपाल का धन नारा काफी प्रचलित है। जिस प्रकार हमारे शरीर के लिए खाना, भोजन, वायु यह सभी चीजें जरूरी है उसी तरह से पेड़ भी जरूरी है क्योंकि जो ऑक्सीजन हमारे शरीर के अंदर प्रभावित करते हैं वह हमें पेड़ों से ही प्राप्त होती है। दरअसल पेड़ कार्बन डाई आक्साइड और अनेक हानिकारक गैसों को अपने अंदर प्रवाहित करके ऑक्सीजन हमारे लिए देते हैं। .

nijgadh 2222
प्रदेश नं 2 के बारा जिला के निजगढ़ में दूसरा अंतर्राष्ट्रीय विमानस्थल बनने की योजना है। इस बारे में तर्क-कुतर्क का दौर चल पड़ा है। एक पक्ष का कहना है कि इस विमानस्थल के लिए निजगढ़ ही सही जगह है। जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि निजगढ़ उपयुक्त जगह नहीं है। निजगढ़ के बजाय कहीं और तराई क्षेत्र के किसी भी भूभाग में बनाया जाए। निजगढ़ के जगह कोई और विकल्प ढूंढ़ा जाए। यदि यहीं यह बनता है तो यह तय है कि वन/जंगल विनाश से वातावरण असंतुलित हो जाएगा। प्राकृतिक प्रकोप की संभावनाएं प्रबल हो जाएगी। 23 प्रजाति के स्तनधारी जीव जन्तु का क्या होगा? कहां जाएंगे?

नेपाल सरकार भारत के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इन्दिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विमानस्थल की तरह निजगढ़ अंतर्राष्ट्रीय विमान स्थल को बनाना चाहती है। जिसमें 22 देशों का ट्रांजिट बनाने की तैयारी है। उम्मीद की जा रही है यदि ऐसा हुआ तो औसतन सालाना 6 करोड़ यात्री इस विमानस्थल से गुजरेंगे। इस परियोजना के लिए कोरियन कंपनी एलएमडब्लु द्वारा तैयार अध्ययन प्रतिवेदन अनुसार, ‘एयरपोर्ट सीटी’ सहित पूर्वाधार बनाने के लिए 80 वर्ग किलोमीटर अर्थात् आठ हजार हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता होगी। इसमें लगभग 8 लाख छोटे-बड़े वृक्ष कट जाएंगे। सवाल यह कि हम वन को उजाड़ तो देंगे लेकिन उसी वन को लगाने और वृक्ष उगाने में काफी पैमाने पर आवश्यक जमीन की पूर्ति कैसे होगी? और इतनी जमीन है कहां?
यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि निजगढ का प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय विमानस्थल नेपाल के प्रदेश नं. 2 के भूभाग में पड़ता है। जो कि सभी प्रदेशों में सबसे छोटा प्रदेश है। इस प्रदेश का क्षेत्रफल 9 हजार वर्ग किलोमीटर है। जबकि यहां जनसंख्या घनत्व सबसे अधिक है। यहां के लाखों लोग वन पर आश्रित है। ऐसे में इन लोगों का क्या होगा। इनके लिए रोजगार सृजन कैसे होगा। इसके अलावा करीब 2 सौ घर-परिवार विस्थापित होंगे। साथ ही लोपन्मुख जीवजन्तु और वनस्पति भी नष्ट हो जाएंगे।
गौर करें तो पाएंगें कि प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय  विमानस्थल के पास दलालों ने जमीन खरीदकर ले रखा है। इसलिए सरकार के ऊपर वन कटनी के लिए दबाव दे रहे हैं। एक् बुद्धिजीवी ने टिप्पणी किया कि वन कटनी के लिए भूमाफिया, वनमाफिया और निर्माण सामग्री माफिया सब वकालत कर रहे हैं। कटे हुए जंगल व नदी उकास जमीन में एयरपोर्ट नहीं बन सकता क्या? जंगल ही क्यूं चुना गया है? वातावरणीय प्रभाव अध्ययन किए बिना निजगढ़ में विमानस्थल बनाने का परियोजना घोषणा कानून विपरीत है। यही वजह है कि इसके विरोध में देश के कोने-कोने में आवाज उठ रही है और सरकार का विरोध किया जा रहा है। कुछेक को छोड़कर अधिकांश लोग इसके विरोध में ही है।
भारत के चिपको आंदोलन की तरह नेपाल में ‘अंगालो अभियान’ चलाने की आवश्यकता है। ज्ञात हो कि चिपको आन्दोलन की शुरूआत 1973 में भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा गौरा देवी के नेतृत्व में हुई थी। आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के चमोली जिले से हुई थी। उस समय उत्तर प्रदेश में पड़ने वाली अलकनंदा घाटी के मंडल गांव में लोगों ने यह आंदोलन शुरू किया। 1973 में वन विभाग के ठेकेदारों ने जंगलों के पेड़ों की कटाई शुरू कर दी थी। वनों को इस तरह कटते देख किसानों ने बड़ी संख्या में इसका विरोध किया और चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई।
वृक्षारोपण करके वृक्ष को बड़ा होने में सौ वर्ष से भी अधिक लग जाएगा। एक वृक्ष के बदले 25 पौधों को रोपने की आवश्यकता है। पौधों को लगाकर उगाने में तमाम मुश्किलें  हैं। जलवायु परिवर्तन से नेपाल भी अछूता नहीं रह गया है। नेपाल में जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए 48 प्रतिषत वन की और आवश्यकता है।
वन जंगल तो वर्तमान में लगा हुआ है। किस ने उस जंगल के वृक्ष को पानी डाला होगा या उगाया होगा? हर चीज का विकल्प है। कोई चीज असंभव नहीं है। वृक्ष काटने का मतलब विकास नहीं विनाश है। विकास और विनाष में जमीन-आसमान का अन्तर है। वास्तव में सही कहा गया है कि ‘‘लिखना तो नहीं आता लेकिन मिटाना दोनों हाथों से आता है’’।
कम नुकसान में विकास भी होना आवश्यक है, लेकिन नुकसान कम से कम हो, यह भी ध्यान देना होगा। विकास तो सबको चाहिए। विमानस्थल बनेगा तो विकास होगा, आर्थिक उन्नति भी होगी। लेकिन विकास का दूसरा नाम विनाश तो नहीं?

 

Check Also

freedom1

व्यक्तिगत आजादी के मामले में नेपाल ने भारत व चीन दोनों को पीछे छोड़ा

निर्भय कर्ण : ग्लोबल लीग टेबल ने विश्व के व्यक्तिगत आजादी से संबंधित देशों की ...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *